अब इन जोग सँदेसनि सुनि सुनि, विरहिनि विरह दही। चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उर तैं धार वही । 'सूरदास' अव धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही ॥

 अब इन जोग सँदेसनि सुनि सुनि, विरहिनि विरह दही। चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उर तैं धार वही । 'सूरदास' अव धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही ॥


अर्थ


परन्तु श्री कृष्ण ने हमारे लिए ज्ञान योग का संदेश भेजकर हमें और भी दुखी कर दिया। हम विरह की आग मे और भी जलने लगी हैं। ऐसे समय में कोई अपने रक्षक को पुकारता है परन्तु हमारे जो रक्षक हैं वहीं आज हमारे दुःख का कारण हैं। हे उद्धव, अब हम धीरज क्यूँ धरें, कैसे धरें. जब हमारी आशा का एकमात्र तिनका भी डूब गया। प्रेम की मर्यादा है कि प्रेम के बदले प्रेम ही दिया जाए पर श्री कृष्ण ने हमारे साथ छल किया है उन्होने मर्यादा का उल्लंघन किया है।