मन क्रम वचन नंद नंदन उर, यह दुढ़ करि पकरी । जागत सोवत स्वप्न दिवस निसि, कान्ह- कान्ह जक री।

 हमारे हरि हारिल की लकरी।


मन क्रम वचन नंद नंदन उर, यह दुढ़ करि पकरी । जागत सोवत स्वप्न दिवस निसि, कान्ह- कान्ह जक री।


अर्थ


इन पंक्तियों में गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण उनके लिए हारिल की लकड़ी हैं। जिस तरह हारिल पक्षी लकड़ी के टुकड़े को अपने जीवन का सहारा मानता है उसी प्रकार श्री कृष्ण भी गोपियों के जीने का आधार हैं। उन्होंने मन कर्म और वचन से नन्द बाबा के पुत्र कृष्ण को अपना माना है। गोपियाँ कहती हैं कि जागते हुए, सोते हुए दिन में, रात में, स्वप्न में हमारा रोम-रोम कृष्ण नाम जपता रहा है।