धूत कहो, अवधूत कहो, रजपूतु कहो, जोलहा कहो कोऊ । काहू की बेटीसों वेटा न व्याहव, काहूकी जाति विगार न सोऊ ॥ तुलसी सरनाम गुलाम हे राम को, जाको रूचे सो कट्टे कछु ओऊ । माँगि के खेवो, मसीत को सोडवो, लेवोको एकु न देवको दोऊ ।

 धूत कहो, अवधूत कहो, रजपूतु कहो, जोलहा कहो कोऊ । काहू की बेटीसों वेटा न व्याहव, काहूकी जाति विगार न सोऊ ॥ तुलसी सरनाम गुलाम हे राम को, जाको रूचे सो कट्टे कछु ओऊ । माँगि के खेवो, मसीत को सोडवो, लेवोको एकु न देवको दोऊ ।


दूसरे सवेये में कवि ने भक्त की गहनता ओर सघनता में उपजे भक्त-हृदय के आत्मविश्वास का सजीव चित्रण किया है। वे कहते हैं कि चाहे कोई मुझे धूर्त कहे, अवधूत या जोगी कहे, कोई टराजपूत या जुलाहा कहे, किंतु में किसी की बेटी से अपने बेटे का विवाह नहीं करने वाला ओर न किसी की जाति विगाड़ने वाला हूँ। में तो केवल अपने प्रभु राम का गुलाम हूँ। जिसे जो अच्छा लगे, वही कहे। में माँगकर खा सकता हूँ तथा मस्जिद में सो सकता हूँ किंतु मुझे किसी से कुछ लेना देना नहीं है। में तो सव प्रकार से भगवान राम को समर्पित हूँ।