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5.3 व्याख्या करें.
माँगि के खैवो, मसीत को सोइवो, लैबको एक न दैवको दोऊ।
उत्तर:- तुलसीदास को समाज के उलाहनों तानों से कोई फर्क नहीं पड़ता कि समाज उनके वारे में क्या सोचता है, वे किसी पर आश्रित नहीं है। वे श्री राम का नाम लेकर दिन बिताते हैं, माँग कर खाते हैं और मस्जिद में सो जाते हैं। उन्हें किसी से कुछ भी लेना देना नहीं है।