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कवि ऋतुराज ने कन्यादान कविता के माध्यम से शादी के बाद स्त्री जीवन में आने वाली विकट परिस्थितियों के बारे में एक संदेश देने की कोशिश की है। कविता में विवाह के पश्चात वेटी की विदाई के वक्त एक मां अपने जीवन के सभी अच्छे व बुरे अनुभवों को निचोड़ कर एक सही व तर्कसंगत सीख देने की कोशिश करती है। ताकि उसकी बेटी ससुराल में सुख व सम्मान पूर्वक जी सके
हिंसा, अत्याचार व शोषण के खिलाफ आवाज उठा सके। कविता में ऑ परंपरागत मान्यताओं से विल्कुल भिन्न है जो अपनी बेटी को परंपरागत आदशों से हट कर सीख दे रही है।
कन्यादान करते समय माँ को ऐसा लग रहा है जैसे वह अपने जीवन की सारी जमा पूंजी दान कर रही हो। लेकिन अंदर ही अंदर वह अपनी बेटी के लिए चिंतित भी थी क्योंकि वह जानती थी कि उसकी बेटी अभी इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह अपने नये जीवन व ससुराल में आने वाली विपरीत परिस्थितियों को समझ कर उनका सामना कर सके।
मां को लगता है कि उसकी बेटी भोली ओर नादान है। उसने अपने जीवन में अभी तक सिर्फ सुख ही सुख देखा है। उसे दुख व परेशानी को वांटना या उनसे निकलना नहीं आता है।
ससुराल में बेटी को किसी तरह की कोई परेशानी ना हो। इसीलिए माँ अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से सीखी हुई अपनी प्रमाणिक सीख को अपनी बेटी को देने की कोशिश करती है।
मां अपनी बेटी को चार बड़ी-बड़ी सीख देती है। पहली सीख में मां बेटी से कहती है कि कभी भी अपने ह सौंदर्य पर अभिमान मत करना क्योंकि यह स्थाई नहीं होता है।
दूसरी सीख में माँ कहती है कि आग का प्रयोग हमेशा खाना बनाने के लिए करना। लेकिन अगर किसी क द्वारा इसका प्रयोग जलाने के लिए किया जाए तो उसका पुरजोर विरोध करना। क्योंकि आग टोटिया सेंकने के लिए होती है जलने या जलाने के लिए नहीं।
यहां पर कवि उन लोगों पर अपने शब्दों से तीक्ष्ण प्रहार कर रहे हैं जो लोग दहेज के लालच में आकर अपनी बहुओं को आग के हवाले करने में तनिक भी नहीं हिचकते।
तीसरी सीख में माँ कहती है कि महिलाओं का वस्त्र और आभूषण के प्रति विशेष मोह होता है। लेकिन तुम इन सवका मोह कभी मत करना क्योंकि ये ही जीवन के सबसे बड़े बंधन बन जाते हैं या महिलाओं के पेटो की जंजीर बन जाते हैं।
ओर अंतिम सीख देते हुए वह कहती है कि लड़की होना पर, लड़की जेसे मत दिखाई देना अर्थात मर्यादा लज्जा, शिष्टता, विनम्रता, ये सव स्त्री सुलभ गुण हैं। इनको तुम वरकरार रखना लेकिन इन्हें कभी अपनी कमजोरी मत वनने देना। अन्याय और अत्याचार का हमेशा डटकर सामना करना उसके खिलाफ अपनी आवाज जरूरना।