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इस पाठ में आजकल के समाचार पत्रों में छप रही चोरी, भ्रष्टाचार, हिंसा, बेईमानी आदि की खबरों को पढ़ने से समाज में निराशा का जो वातावरण बना है, उससे लेखक ने चिंता व्यक्त की है। यद्यपि समाज में अच्छे और बुरे दोनों काम करने वाले लोग हैं पर हमें अच्छे काम करनेवालों से प्रेरणा लेकर आशावादी होना चाहिए। जब लेखक आजकल के समाचार पत्रों को देखता है तो उसमें ठगी, डकैती, तस्करी, चोरी और भ्रष्टाचार के समाचारों की बहुलता होती है, जिसे देखकर उसका मन दुखी हो जाता है। इनमें एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप किया रहता है। इसे देखकर तो यही लगता है कि देश में कोई ईमानदार रह ही नहीं गया है। ऐसे में हर व्यक्ति गुणी कम, दोषी अधिक दिखता है। ऊँचे पद पर आसीन व्यक्ति ज्यादा ही दोपी दिखाई देता है। दोषों को इतना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है कि उसके सारे गुण छिप जाते हैं।
उसके गुणों को विल्कुल ही छिपा देना चिंता का विषय है। लेखक का मानना है कि भारत भूमि पर बड़े-बड़े मनीषी पैदा हुए हैं। मानवता हमारा आधार है। यहाँ आर्य और द्रविड़, हिंदू और मुसलमान, यूरोपीय और अन्य संस्कृतियों का मेल हुआ है। यह मानव महासमुद्र कभी सूख नहीं सकता। यहाँ विभिन्न जातीय रूपी बूंदें मिलकर मानव संसार रूपी महासागर बनाती हैं। इसी के साथ यह भी सही है कि आजकल कुछ इस तरह का वातावरण बना हुआ है कि परिश्रमी और भोले-भाले परेशान हैं तथा फ़रेब का व्यापार करने वाले उन्नति करते जा रहे हैं। इस माहौल में ईमानदारी, सच्चाई, मेहनत आदि वेवसी बनकर रह गई है। इससे जीवन के मानवीय मूल्यों के प्रति लोगों की आस्था विचलित होने लगी है।
भारत वह देश है जहाँ भौतिक वस्तुओं के संग्रह को महत्त्व नहीं दिया जाता। यहाँ मनुष्य के आंतरिक भावों को ही विशेष माना जाता है। हर व्यक्ति में लोभ-मोह, काम-क्रोध आदि भरे हैं, पर इन्हें प्रधान मानकर मन को इनके इशारे पर नहीं छोड़ना चाहिए। इन्हें संयत रखने का प्रयास करना चाहिए तथा आवश्यकतानुसार ही इनका प्रयोग करना चाहिए। इस देश के करोड़ों करोड़ों गरीबों की हीन अवस्था दूर करने के लिए कानून बनाए जाते हैं, जिनका लक्ष्य कृषि, उद्योग, वाणिज्य, शिक्षा और स्वास्थ्य को बेहतर बनाना होता है। पर इन कार्यों में जिन लोगों को लगाया जाता है, वे वास्तविक उद्देश्य से भटककर स्वयं ही फ़ायदा उठाने में लग जाते हैं।
भारतवर्ष में कानून को धर्म के रूप में देखा जाता रहा है, किंतु वर्तमान में इसमें भी बदलाव आ गया है। लोग धर्म और कानून में अंतर मानकर कानून को धोखा देने लगे हैं। लोग धर्म से तो डरते हैं पर कानून का अनुचित लाभ उठा जाते हैं। कहने को कुछ भी कहा जाए, पर धर्म कानून से बड़ी चीज है। धर्म ही है जो सेवा, ईमानदारी, सच्चाई और आध्यात्मिकता का मूल्य बनाए हुए है। धर्म दवा ज़रूर है, पर नष्ट नहीं हुआ है। वह आज भी मनुष्य से प्रेम करता है, स्त्रियों का सम्मान करता है, झूठ और चोरी को पाप समझता है। समाचार पत्रों में भ्रष्टाचार के प्रति इतना आक्रोश यही सिद्ध करता है कि हम इनको गलत समझते हैं और गलत तरीके से धन या मान का संग्रह करनेवालों की प्रतिष्ठा कम करना चाहते हैं।
लेखक बुराई का पर्दाफ़ाश करना अच्छा समझता है, पर किसी के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करते हुए रस या आनंद लेना अच्छी बात नहीं समझता। वास्तव में, अच्छाई को रस लेकर उद्घाटित करना चाहिए। अच्छी घटनाओं को उजागर करने से दूसरों के मन में अच्छी भावना वलवती होती है। इसी संबंध में एक घटना के बारे में लेखक बताता है कि एक बार टिकट लेते समय उसने टिकट बाबू को दस की जगह सौ का नोट थमा दिया और जल्दी में गाड़ी में आकर बैठ गया। कुछ देर बाद वह टिकट बावू नव्वे रुपये लिए डिब्बे में आया और लेखक को पहचानकर नव्वे रुपये दे दिस। उस समय टिकट बाबू के चेहरे पर संतोष की गरिमा देखते ही बनती थी।
दूसरी घटना के अनुसार, लेखक सपरिवार बस में यात्रा कर रहा था। वस में कुछ खराबी थी, जिससे वह रुक-रुककर चल रही थी। वस गंतव्य से आठ किलोमीटर पहले ही सुनसान जगह पर खड़ी हो गई। बस के कंडक्टर ने एक साइकिल उठाई और चलता बना। संदेह एवं भय से त्रस्त लोगों ने तरह-तरह की बातें शुरू कर दी। कोई दो दिन पहले यहीं हुई डकैती की बात कहता तो कोई कुछ और लेखक सपरिवार था। बच्चे पानी-पानी चिल्ला रहे थे, परंतु पानी वहाँ उपलब्ध न था। कुछ नौजवानों ने ड्राइवर को पीटने का मन बनाया। ड्राइवर कातर ढंग से लेखक की ओर देखने लगा। लेखक के समझाने पर नौजवानों ने उसे बंधक बना लिया और अलग लेकर चले गए कि यदि बस का कंडक्टर डाकुओं को लेकर आता है तो पहले इस ड्राइवर को ही खत्म कर दिया जाए। इस बीच डेढ़-दो घंटे बीत गए। बच्चे भोजन-पानी के लिए व्याकुल थे।
लेखक की पत्नी अलग परेशान थी। लेखक ने ड्राइवर को पिटने से बचा तो लिया, पर वह भी घबराया हुआ था। तभी लेखक ने देखा कि कंडक्टर बस अड्डे से खाली बस लिए चला आ रहा है। उसने आते ही कहा कि वह बस चलने लायक नहीं थी। अब इस बस पर बैठिए। उसने अपने साथ लोटे में लाए पानी और थोड़े दूध को लेखक के बच्चों को दिया। सबने उसे धन्यवाद देकर ड्राइवर से माफ़ी माँगी और बस बारह बजे से पहले अपने गंतव्य तक पहुँच गई। लेखक कई बार ठगी और धोखे का शिकार हुआ है, पर उसके साथ विश्वासघात कम ही हुआ है। उसका मानना है कि कष्टकर चीज़ों का हिसाब रखने से जीवन कष्टकर हो जाएगा। कई बार लोगों ने अकारण उसकी सहायता भी की है, निराश मन को दिलासा और हिम्मत प्रदान की है।
रवींद्रनाथ ने ईश्वर से प्रार्थना करते हुए लिखा है कि यदि केवल धोखा खाना पड़े या नुकसान उठाना पड़े तो भी, हे प्रभो! इतनी शक्ति देना कि में तुम्हारे ऊपर
संदेह न करूं।"
अंत में लेखक कहता है कि मनुष्य की बनाई नीतियाँ यदि आज गलत हो रही हैं तो उन्हें बदलने की ज़रूरत है। अब भी आशा की ज्योति वुझी नहीं है। हमारे उन्नति और विकास के रास्ते अब भी खुले हैं। अतः मानव मन को निराश होने की आवश्यकता नहीं है।