हिंदी-नेताजी का चश्मा

 हिंदी-नेताजी का चश्मा


पाठ का सार

हालदार साहब को हर पंद्रहवें दिन कंपनी के काम से एक कस्बे से गुजरना पड़ता था। कस्वा बहुत बड़ा नहीं था। लेकिन उसमें एक लड़कों का स्कूल, एक लड़कियों का स्कूल, एक कारखाना, दो ओपन एयर सिनेमाघर और एक नगरपालिका भी थी। अब नगरपालिका थी, तो कुछ न कुछ करती भी रहती थी। इसी नगरपालिका के किसी उत्साही बोर्ड या प्रशासनिक अधिकारी ने एक बार मुख्य बाजार के मुख्य चैराहे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की एक संगमरमर की प्रतिमा गवा दी। अच्छी मूर्ति की लागत 4 अनुमान और उपलब्ध वजट से कहीं ज्यादा हो रही थी। अंत में कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के ड्राइंग मास्टर को मूर्ति बनाने का काम सौंपा गया। मूर्ति सुंदर थी। केवल एक चीज की कसर थी। नेताजी की आँख पर चश्मा नहीं था।

एक सचमुच के चश्मे का चैड़ा काला फ्रेम मूर्ति को पहना दिया गया था। हालदार साहब ने पहली बार मूर्ति को देखा तो सोचा- वाह भई! यह आइडिया भी ठीक है। मूर्ति पत्थर की, लेकिन चश्मा रियत्र । दूसरी बार हालदार साहव कस्वे से गुजरे तो मूर्ति पर तार के फ्रेम वाला गोल चश्मा था। तीसरी बार फिर नया चश्मा था। इस बार वे पानवाले से पूछ ही वैठे कि नेताजी का चश्मा हर बार बदल केसे जाता है। पानवाले ने बताया कि केप्टन चश्मेवाला ऐसा करता है। हालदार साहब समझ गए कि चश्मेवाले को नेताजी की मूर्ति विना चश्मे के बुरी लगती होगी, इसलिए अपने उपलब्ध फ्रेमों में से एक को वह नेताजी की मूर्ति पर फिट कर देता होगा। जब किसी ग्राहक को वैसा ही फ्रेम चाहिए होता है जैसा कि मूर्ति पर लगा है, तो केटन वह फ्रेम मूर्ति से उतारकर ग्राहक को देता है और मूर्ति पर नया फ्रेम लगा देता है। किसी कारणवश मूर्ति के लिए ओरिजनल चश्मा बना ही न था।

हालदार साहब ने पानवाले से जानना चाहा कि केएन चश्मेवाला नेताजी का साथी है या आजाद हिंद फौज का भूतपूर्व सिपाही? उसने बताया कि वह लँगड़ा क्या फौज में जाएगा। यह तो उसका पागलपन है। हालदार साहब को पानवाले द्वारा एक देशभक्त का मजाक उड़ाया जाना अच्छा नहीं लगा। केप्टन चश्मेवाले की दुकान नहीं थी, वह फेरी लगाकर चश्मे वेचता था। दो सात्र के भीतर हालदार साहव ने नेताजी की मूर्ति पर कई तरह के चश्मे लगे देखे। एक बार जब हालदार साहव कस्वे से गुजरे, तो मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं था। पूछने पर पता चला कि कैप्टन मर गया। उन्हें बहुत दुख हुआ। पंद्रह दिन बाद कस्वे से गुजरे, तो सोचा कि वहाँ नहीं रुकेंगे, पान भी नहीं खाएँगे, मूर्ति की ओर देखेंगे भी नहीं। लेकिन आदत से मजदूर चैराहा आते ही आँखें मूर्ति की ओर उठ गई। वे जीप से उतरे और मूर्ति के सामने जाकर खड़े हो गए। मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना छोटा-सा चश्मा रखा था, जैसा बच्चे बना लेते हैं। यह देखकर हालदार साहब की आँखें भर आई।