हो जाए न पथ में रात कहीं, मंजिल भी तो है दूर नही यह सोच थका दिन का पथी थी जल्दी-जल्दी चलता है। दिन जल्दी जल्दी ढलता है!

 हो जाए न पथ में रात कहीं, मंजिल भी तो है दूर नही यह सोच थका दिन का पथी थी जल्दी-जल्दी चलता है। दिन जल्दी जल्दी ढलता है!


प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह, भाग-2' में संकलित गीत दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!' से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध गीतकार हरिवंश राय बच्चन हैं। इस गीत में कवि ने एकाकी जीवन की कुंठा

तथा प्रेम की व्याकुलता का वर्णन किया है।

व्याख्या कवि जीवन की व्याख्या करता है। वह कहता है कि शाम होते देखकर यात्री तेजी से चलता है कि कहीं रास्ते में रात न हो जाए। उसकी मंजिल समीप ही होती है इस कारण वह थकान होने के बावजूद भी जल्दी-जल्दी चलता है। लक्ष्य प्राप्ति के लिए उसे दिन जल्दी ढलता प्रतीत होता है। रात होने पर पथिक को अपनी यात्रा बीच में ही समाप्त करनी पड़ेगी, इसलिए थकित शरीर में भी उसका उल्लसित, तरंगित और आशान्वित मन उसके पैरों की गति कम नहीं होने देता।