किस ओर चले? यह मत पूछो। चलना है, बस इसलिए चले, जग से उसका कुछ लिए चले, जग को कक छ दिए चले,

 किस ओर चले? यह मत पूछो। चलना है, बस इसलिए चले, जग से उसका कुछ लिए चले, जग को कक छ दिए चले,


दीवानों की हस्ती भावार्थ: दीवानों की हस्ती कविता में आगे कवि कहते हैं कि मुझसे मत पूछो में कहाँ जा रहा हूँ। मुझे तो वस चलते रहना है, इसीलिए मैं चले जा रहा हूँ। मैनें इस दुनिया हक ज्ञान प्राप्त किया है, अब मैं उस ज्ञान को बाकी लोगों के साथ वाँटना चाहता हूँ। इसलिए मुझे निरंतर चलते रहना होगा।