आबो-ताब अशआर न पूछो तुम भी आँखे रक्खो हो ये ज़गमग वैतों की दमक है या हम मोती रोले हैं।

आबो-ताब अशआर न पूछो तुम भी आँखे रक्खो हो ये ज़गमग वैतों की दमक है या हम मोती रोले हैं।


प्रसंग- प्रस्तुत शेर हमारी पुस्तक आरोह, भाग-2' में संकलित गजल से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें कवि ने अपने काव्य सुजन का आधार अपनी व्यथा बताया है।


व्याख्या कवि कहता है कि तुमे मेरी शायरी में जो चमक-दमक दिखाई देती है, उस पर फ़िदा मत होओ। तुम्हें अपनी आँखें खुली चाहिए अर्थात ध्यान से देखना चाहिए। मेरे शेरों में जो चमक है, वह मेरे आँसुओं की देन है। दूसरे शब्दों में, कवि की पीड़ा से उसके काव्य में दर्द उभर कर आया है।