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नोटस गुंचे पंखड़ियों की नाजुक गिरहें खोले हैं या उड़ जाने को टंगो-वू गुलशन में पर तोले हैं।
तारे आँखें झपकातें हैं जर्रा-जर्रा सोये हैं
तुम भी सुनो हो याटो ! शव में सन्नाटे कुछ वोले हैं
हम हों या किस्मत हो हमारी दोनों को इक ही काम मिला किस्मत हमको टो लेते है हम किस्मत को टो ले हैं।
जो मुझको वदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं
ये कीमत भी अदा कटे हैं हम वदुरुस्ती-ए-होशो-हवास तेटा सोदा करने वाले दीवाना भी हो ले हैं।
तेरे गम का पासे अदव हे कुछ दुनिया का खयाल भी हे सबसे छिपा के दर्द के माटे चुपके-चुपके टो ले हैं
फ़ितरत का कायम हे तवाजुन आलमे-हुस्नो-इश्क में भी उसको उतना ही पाते हैं खुद को जितना खो ले हैं
आवो ताव अशुआर न पूछो तुम भी आँखें टक्खो हो ये जगमग वेतों की दमक है या हम मोती टोले हैं।
ऐसे में तू याद आए है अंजुमने-मय में टिंदों को रात गए गर्दू पे फ़रिश्ते वावे गुनह जग खोले हैं -
सदके फ़िटाक एजाजे-सुखन के केसे उड़ा ली ये आवाज़ इन गज़लों के परदों में तो मीट की गजलें बोले हैं
प्रतिपादय रुवाइयों की तरह फ़िटाक की गजलों में भी हिंदी समाज ओर उर्दू शायटी की परंपरा भरपूर है। इस गजल में दर्द और पीड़ा के साथ-साथ शायर की ठसक भी अंतर्निहित है।
सार- इस गजल के माध्यम से शायर कहता है कि लोगों ने हमेशा उस पर कटाक्ष किए हैं ओर साथ ही उसकी किस्मत ने भी कभी उसका साथ नहीं दिया। गम उसके साथ हमेशा रहा। उसे लगता है जैसे रात का सन्नाटा उसे वुला रहा है। शायर कहता है कि इश्क वही कर सकता है जो अपना सब कुछ खो देता है। जब शरावी शराव पिलाते हैं तो उसे अपनी प्रेमिका की याद आ जाती है। अंतिम शेट में वह यह स्वीकार करता है कि उसकी गजलों पर मीट की गजलों का प्रभाव है।
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