हम भिखमंगों की दुनिया में, स्वच्छंद प्यार चले, हम एक निसानी सी उर पर, ले असफलता का भार चले।

 हम भिखमंगों की दुनिया में,

स्वच्छंद प्यार चले,

हम एक निसानी सी उर पर,

ले असफलता का भार चले।


दीवानों की हस्ती भावार्थ: दीवानों की हस्ती कविता की इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि ये दुनिया बड़ी ही स्वार्थी है। लोग स्वार्थ में इतने अंधे हैं कि वस भिखमंगों की तरह सबसे कुछ ना कुछ माँगते ही रहते हैं। मगर, कवि स्वार्थी नहीं हैं, इसलिए उन्होंने स्वार्थी दुनिया पर बिना किसी शर्त के अपना अनमोल प्यार लुटाया है। लोगों को प्यार वाँटने का खूबसूरत एहसास हमेशा कवि के दिल में रहता है। उन्होंने जीवन में काफी वार असफलता और हार का स्वाद भी चखा है, लेकिन इसका बोझ उन्होंने कभी किसी दूसरे व्यक्ति पर नहीं डाला। इस तरह कवि ने स्वार्थी दुनिया को भरपूर प्यार दिया और नाकामयावी का भार हमेशा स्वयं ही उठाया है।