अब अपना और पराया क्या? आवाद रहें रुकने वाले! हम स्वयं बँधे थे और स्वयं हम अपने बँधन तोड़ चले।

 अब अपना और पराया क्या? आवाद रहें रुकने वाले! हम स्वयं बँधे थे और स्वयं हम अपने बँधन तोड़ चले।


दीवानों की हस्ती भावार्थ: दीवानों की हस्ती कविता की इन अंतिम पंक्तियों में कवि कहते हैं कि अब उनके लिए दुनिया में कोई भी अपना या पराया नहीं है। जो लोग एक मंज़िल पाकर, वहीं ठहर जाना चाहते हैं, उन्हें कवि ने सुखी और आबाद रहने का आशीर्वाद दिया है। मगर, कवि ख़ुद एक जगह वंध कर नहीं रहना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने अपने सभी सांसारिक बंधन तोड़ दिये हैं और अब वो अपने तन हुए मार्ग पर आगे बढ़ते जा रहे हैं। वो इसी में ख़ुश और संतुष्ट हैं।