बच्चे प्रत्याशा में होंगे, नींड़ों से झाँक रहे होगे दिन जलदी- जल्दी ढलता है। यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है

 बच्चे प्रत्याशा में होंगे,

नींड़ों से झाँक रहे होगे दिन जलदी- जल्दी ढलता है।

यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!

प्रसंग- प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक 'आरोह, भाग-2' में संकलित गीत दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।' से उद्धृत है। इस गीत के रचयिता हरिवंश राय बच्चन हैं। इस गीत में कवि ने एकाकी जीवन की कुंठा तथा प्रेम की व्याकुलता का वर्णन किया है।

व्याख्या कवि प्रकृति के माध्यम से उदाहरण देता है कि चिड़ियाँ भी दिन ढलने पर चंचल हो उठती हैं। वे शीघ्रातिशीघ्र अपने घोंसलों में पहुँचना चाहती हैं। उन्हें ध्यान आता है कि उनके बच्चे भोजन आदि की आशा में घोंसलों से वाहर झाँक रहे होंगे। यह ध्यान आते ही उनके पंखों में तेजी आ जाती है और वे जल्दी जल्दी अपने घोंसलों में पहुँच जाना चाहती हैं।