विज्ञापन और हमारा जीवन

 विज्ञापन और हमारा जीवन

विचार-बिंदु विज्ञापन का उद्देश्य विज्ञापनों के विविध प्रकार निर्णय को प्रभावित करने में विज्ञापनों की भूमिका • विज्ञापनों का सामाजिक दायित्व निष्कर्ष विज्ञापन का उद्देश्य किसी वस्तु विचार कार्यक्रम या संदेश के प्रचार-प्रसार के लिए जो साधन-सामग्री प्रयोग लाई जाती

है, उसे विज्ञापन कहते हैं। विज्ञापन का उद्देश्य संबंधित वस्तु या संदेश को दूर-दूर तक फैलाना होता है।

विज्ञापनों के विविध प्रकार विज्ञापनों के अनेक प्रकार होते हैं। सामाजिक विज्ञापनों के अंतर्गत दहेज, नशा, परिवार नियोजन

आदि संदेश आते हैं। विभिन्न कार्यक्रमों, रेलियों, आंदोलनों के विज्ञापन भी इसके अंतर्गत आते हैं। कुछ विज्ञापन विवाह, नौकरी, संपत्ति की खरीद-बेच संबंधी होते हैं। सबसे लोकप्रिय और लुभावने विज्ञापन होते हैं-व्यापारिक विज्ञापन व्यापारी और उद्योगप अपने माल को दूर-दूर तक बेचने के लिए अत्यंत आकर्षक विज्ञापनों का प्रयोग करते हैं। निर्णय को प्रभावित करने में विज्ञापनों की भूमिका मनुष्य कौन-सा माल खरीदे इसमें विज्ञापनों की भूमिका सबसे बर्फ

होती है। कोई भी व्यक्ति दुकान पर खड़ा होकर विविध वस्तुओं में से प्रसिद्ध वस्तुओं को ही चुन पाता है। चाहे बाजार में कितने

भी श्रेष्ठ साबुन उपलब्ध हो, किंतु ग्राहक उन्हीं को खरीदता है जिनका उसने विज्ञापन सुना है। जब मनुष्य बहुत सारी विविधताओं

में फँस जाता है तो विज्ञापन ही निर्णय कराने में सहायक होते हैं।

विज्ञापनों का सामाजिक दायित्व-विज्ञापन प्रभावकारी होते हैं। इसलिए उनका सामाजिक दायित्व भी बहुत बड़ा होता है। प्रायः माल बेचने के लिए भ्रामक विज्ञापन दिए जाते हैं। गलत तथा दूषित माल बेचने के लिए भी आकर्षक सितारों का उपयोग किया जाता है। पीछे शाहरुख खान से कहा गया कि वे कोका कोला या पेप्सी आदि हानिकारक पेयों का विज्ञापन न करें। परंतु उन्होंने पैसे के लोभ में इसकी जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी। वास्तव में विज्ञापन से जुड़े हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वे विज्ञापन न छापें। इससे समाज में गलत वस्तुओं और संदेशों का प्रचार होता है।


निष्कर्ष निष्कर्ष यह है कि विज्ञापनों में समाज को प्रभावित करने की अद्भुत शक्ति है ये सरकार, व्यापार तथा समाज


के लिए वरदान हैं परंतु गलत हाथों में पड़कर इनका दुरुपयोग भी हो सकता है। इस दुरुपयोग से बचा जाना चाहिए।


रंग-बिरंगी अद्भुत न्यारी, विज्ञापन की दुनिया प्यारी







51. वन और हमारा पर्यावरण


विचार-बिंदु वन और पर्यावरण प्रदूषण निवारण में सहायक वनों की अन्य उपयोगिता वन संरक्षण की

आवश्यकता |


बन और पर्यावरण-वन और पर्यावरण का गहरा संबंध है। ये सचमुच जीवनदायक हैं। ये वर्षा लाने में सहायक होते हैं और धरती की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाते हैं। वन ही वर्षा के धारासार जल को अपने भीतर सोखकर बाढ़ का खतरा रोकते हैं। यही रुका हुआ जल धीरे-धीरे सारे पर्यावरण में पुनः चला जाता है। वनों की कृपा से ही भूमि का कटाव रुकता है। सूखा कम पड़ता है तथा


रेगिस्तान का फैलाव रुकता है। प्रदूषण-निवारण में सहायक आज हमारे जीवन की सबसे बड़ी समस्या है-पर्यावरण प्रदूषण कार्बन डाइऑक्साइड, गा धुआँ, कर्णभेदी आवाज़, दूषित जल-इन सबका अचूक उपाय है- वन संरक्षण वन हमारे द्वारा छोड़ी गई गंदी साँसों को, कार्बन डाइऑक्साइड को भोजन के रूप में ले लेते हैं और बदले में हमें जीवनदायी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। इन्हीं जंगलों में असंख्य


अलभ्य जीव-जंतु निवास करते हैं जिनकी कृपा से प्राकृतिक संतुलन बना रहता है। आज शहरों में लगातार ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा

ध्वनि प्रदूषण भी रोकते हैं। यदि शहरों में उचित अनुपात में पेड़ लगा दिए जाएँ तो प्रदूषण की भयंकर समस्या का समाधान हो सकता है। परमाणु ऊर्जा के खतरे को तथा अत्यधिक ताप को रोकने का सशक्त उपाय भी वनों के पास है। है। वन और वृक्ष बनों की अन्य उपयोगिता-वन ही नदियों, झरनों और अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों के भंडार हैं। इनमें ऐसी दुर्लभ वनस्पतियाँ क्षित रहती हैं जो सारे जग को स्वास्थ्य प्रदान करती हैं। गंगा-जल की पवित्रता का कारण उसमें मिली वन्य औषधियों ही हैं। अतरिक्त वन हमें लकड़ी, फूल-पत्ती, खाद्य पदार्थ, गोंद तथा अन्य सामान प्रदान करते हैं।

है। वन और वृक्ष ध्वनि प्रदूषण भी रोकते हैं। यदि शहरों में उचित अनुपात में पेड़ लगा दिए जाएँ तो प्रदूषण की भयंकर समस्या का समाधान हो सकता है। परमाणु ऊर्जा के खतरे को तथा अत्यधिक ताप को रोकने का सशक्त उपाय भी वनों के पास है। बनों की अन्य उपयोगिता-वन ही नदियों, झरनों और अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों के भंडार हैं। इनमें ऐसी दुर्लभ वनस्पतियाँ रहती हैं जो सारे जग को स्वास्थ्य प्रदान करती हैं। गंगा-जल की पवित्रता का कारण उसमें मिली वन्य औषधियाँ ही हैं।


इसके अतिरिक्त वन हमें लकड़ी, फूल-पत्ती, खाद्य पदार्थ, गोंद तथा अन्य सामान प्रदान करते हैं। सुरक्षित वन संरक्षण की आवश्यकता दुर्भाग्य से आज भारतवर्ष में केवल 23% वन रह गए हैं। अंधाधुंध कटाई के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। वनों का संतुलन बनाए रखने के लिए 10% और अधिक वनों की आवश्यकता है। जैसे-जैसे उद्योगों की संख्या बढ़ती जा रही है, वाहन बढ़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे वनों की आवश्यकता और अधिक बढ़ती जाएगी।

52. जल ही जीवन है



विचार-बिंदु • जल 'जीवन' का पर्याय प्रकृति का वरदान जल संकट की स्थिति जल प्रबंधन के उपाय | जल 'जीवन' का पर्याय-जल है, तभी जीवन है। वैज्ञानिक कहते हैं-मनुष्य जल से जन्मा है। जल न हो, तो कोई भी खाय पेय पदार्थ बन नहीं सकता। इनके बिना मनुष्य जी नहीं सकता। तभी सभी मानव सभ्यताएँ नदियों, झरनों या सरोवरों के इर्द-गिर्द जन्मी: फली-फूली और विकसित हुई। ऐसे जल को जीवन कहना ठीक ही है।

प्रकृति का वरदान - जल प्रकृति का वरदान है। इसे फैक्ट्रियों में नहीं बनाया जा सकता। हाँ, इससे फैक्ट्रियाँ चलाई जा सकती हैं। धरती पर जितना जल है उसका 97.3% जल खारे समुद्र में एकत्र है। इसका उपयोग नहीं हो सकता। 2% जल दक्षिणी और उत्तरी ध्रुवों में हिम के रूप में जमा है। शेष बचे 0.07 जल में से 0.06 नदियों-झरनों में प्रवाहित है। मात्र 0.01% जल धरती के गर्भ में सुरक्षित है।

जल संकट की स्थिति आज हम जल संकट में से गुजर रहे हैं। उसके दो कारण हैं-बढ़ती आबादी और जल का कुप्रबंधन।

आबादी बढ़ रही है तो उसको पीने-नहाने-धोने के लिए जल चाहिए उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए उद्योग-धंधे और मकान

भी चाहिए। इन सबके लिए चाहिए जल जबकि जल के स्रोत वही हैं पुराने जल प्रबंधन के उपाय- यदि बढ़ती हुई जरूरतों के हिसाब से मनुष्य जल का विवेकपूर्ण प्रबंधन कर ले, तब भी जल संकट हो सकता है। परंतु इस दिशा में आज का मनुष्य चिंतित तो है, पर तैयार नहीं है।

वर्षा का जल पेय होता है, उपयोगी होता है। परंतु उसका 80% भाग नदी-नालों में बहकर वापस समुद्र में चला जाता है। यदि उस जल को जंगलों, वनस्पतियों, तालावों या भू-गर्भीय स्रोतों में रोक लिया जाए तो हम जल संकट से उबर सकते हैं। इसके लिए जंगलों को हरा-भरा और समृद्ध बनाना जरूरी है। दूसरे, खुले और ढके हुए तालाबों को स्वच्छ और भरपूर रखना आवश्यक है। तीसरे, वर्षा जल को भूमि के गर्भ में पहुँचाना आवश्यक है। चीये, नदियों के पवित्र जल को गंदगी और रासायनिक कचरे से दूर रखना आवश्यक है। जितनी जल्दी हम चेतेंगे, उतनी जल्दी जीवनदायी जल को संरक्षित कर सकेंगे और जीवन रूपी अमृत का पान कर सकेंगे। रहीम ने बहुत पहले कह दिया था

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून


53. ग्लोबल वार्मिंग विचार 

बिंदु-• अर्थ • प्राकृतिक असंतुलन वार्मिंग के कारण • उपाय।


धरती पर जलवाय ऐसी है कि इस पर वनस्पति पैदा हो सकी, जल के स्रोत बन सके और जीव पैदा हो सका। यह जीवन लीला ग्लोबल वार्मिंग–घरती जीवनदायिनी है। चंद्र-मंगल आदि ग्रहों पर जीवन नहीं है। इसका कारण है-पर्यावरण या वातावरण । मी चल सकती है जबकि यहाँ का प्राकृतिक वातावरण निर्दोष बना रह सके।

● प्राकृतिक असंतुलन दुर्भाग्य से आज पर्यावरण का यह संतुलन टूट गया है। जीवन जीने के लिए जितना प जितना जल चाहिए, जितने वृक्ष-जंगल चाहिए, जितनी बर्फ, जितने ग्लेशियर और नदियाँ चाहिए, उन सबमें खलल पड़ गया है। घग्नी पर जितने हिमखंड चाहिए और जितना समुद्री जल चाहिए, उसका संतुलन बिगड़ गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि रोज एकड़ों जमीन समुद्र में समाती जा रही है। उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले पहाड़ पिघल-पियल कर समुद्र में मिलने जा रहे हैं। इसके कारण समुद्र का जल बढ़ता जा रहा है। भय है कि आने वाले 30-40 सालों में मद्रास, मुंबई आदि के समुद्रतट अपने किनारे बसे नगरों को लील जाएंगे। जैसे भगवान कृष्ण की द्वारिका नगरी समुद्र में समा गई थी, वैसे ही एक दिन सारी धरती ज हो जाएगी। यह संसार जल-प्रलय में डूब जाएगा जो जल जीवन देता है वही एक दिन जीवन को नष्ट कर देगा।


बामिंग के कारण-जल की इस विनाशलीला का कारण है-पर्यावरण में बढ़ता हुआ ताप जितनी मात्रा में हम किए, ए.सी. परमाणु भट्टियाँ या कार्बन छोड़ने वाले रसायनों का उपयोग कर रहे हैं; वातावरण में डीजल-तेल या खतरनाक रसायनों को जला रहे हैं। साथ ही नमी पैदा करने वाले जंगलों और वनस्पतियों को काट रहे हैं, उससे गर्मी भीषण रूप से बढ़ रही है। पूरे वायुमंडल में गर्मी का एक गुब्बार-सा छा गया है। परिणामस्वरूप हमारे पर्यावरण पर कवच की तरह जमी ओजोन गैस की परत में के रोग पैदा कर रही हैं। आज मनुष्य के लिए खुली हवा और

इसके वन-संरक्षण की आवश्यकता दुर्भाग्य से आज भारतवर्ष में केवल 23% वन रह गए हैं। अंधाधुंध कटाई के कारण यह न हुई है। वनों का संतुलन बनाए रखने के लिए 10% और अधिक वनों की आवश्यकता है। जैसे-जैसे उद्योगों की संख्या बढ़ती जा रही है, वाहन बढ़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे वनों की आवश्यकता और अधिक बढ़ती जाएगी। ति उत्पन्न मितते-जुलते निबंध वन रहेंगे हम रहेंग

प्राकृतिक असंतुलन दुर्भाग्य से आज पर्यावरण का यह संतुलन टूट गया है। जीवन जीने के लिए जितना प जितना जल चाहिए, जितने वृक्ष-जंगल चाहिए, जितनी बर्फ, जितने ग्लेशियर और नदियाँ चाहिए, उन सबमें खलल पड़ गया है। पर जितने हिमखंड चाहिए और जितना समुद्री जल चाहिए, उसका संतुलन बिगड़ गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि आ रोज एकड़ों जमीन समुद्र में समाती जा रही है। उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले पहाड़ पिघल-पिघल कर समुद्र में मिलने हैं। इसके कारण समुद्र का जल बढ़ता जा रहा है। भय है कि आने वाले 30-40 सालों मद्रास, मुंबई आदि के समुद्र तट अपने किनारे बसे नगरों को सील जाएँगे। जैसे भगवान कृष्ण की दारिका नगरी समुद्र में समा गई थी, वैसे ही एक दिन सारी धरती जनम हो जाएगी। यह संसार जल-प्रलय में डूब जाएगा। जो जल जीवन देता है वही एक दिन जीवन को नष्ट कर देगा

वामिंग के कारण-जल की इस विनाशलीला का कारण है-पर्यावरण में बढ़ता हुआ ताप जितनी मात्रा में हम फिर ए.सी. परमाणु भट्टियाँ या कार्बन छोड़ने वाले रसायनों का उपयोग कर रहे हैं; वातावरण में डीजल-तेल या खतरनाक रसायनों को जला रहे हैं। साथ ही नमी पैदा करने वाले जंगलों और वनस्पतियों को काट रहे हैं, उससे गर्मी भीषण रूप से बढ़ रही है। पूरे वायुमंडल में गर्मी का एक गुब्बार-सा छा गया है। परिणामस्वरूप हमारे पर्यावरण पर कवच की तरह जमी ओजोन गैस की परत में छेद हो गया है। इससे सूर्य की विषैली किरणें तरह-तरह के रोग पैदा कर रही हैं। आज मनुष्य के लिए खुली हवा और धूप में निकलना भी दूभर हो गया है।


इस ताप को बढ़ाने में आज का मनुष्य दोपी है। वह सुख-सुविधा के मोह में अपनी मौत का सामान इकट्ठा कर रहा है।


इसीलिए कवि ने लिखा है


ओ मनुज गर ताप को तू यों बढ़ाता जाएगा।


मत समझ यह जग जलेगा, तू भी न बच पाएगा। आज जिस धरती को तूने है बनाया आग-स

तू सुलस कर खुद इसी में एक दिन मर जाएगा।

-अशोक बा


उपाय-धरती को ताप से बचाने का एक ही उपाय है अपने पापों का प्रायश्चित करना जिन-जिन कारणों से हमने ताप बढ़ाया है, कष्ट उठाकर भी उन कारणों को बढ़ने से रोकना पीधे लगाना, हरियाली उगाना मशीनी जीवन की बजाय प्रकृति की गोद में लौटना।


54. उत्तराखंड में जलप्रलय


•विचार-बिंदु उत्तराखंड में जलप्रलय कारण बादल फटना और बारिश विनाश के दृश्य बचाने के उपाय।


उत्तराखंड में जलप्रलय-16 जून, 2013 रात लगभग 8 बजे का समय था। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के तीर्थयात्री अपने-अपने परिवारों के साथ हमेशा की तरह उत्साह और खुशी से चारों धामों की यात्रा में मग्न थे। अचानक बारिश शुरू हुई। कहीं बादल फटे। सवा आठ बजे पहाड़ टूट-टूट कर मानो धरती पर लुढ़कने की होड़ करने लगे। चारों ओर से पत्थर, चट्टानें और गाद-भरा पानी भयंकर बाढ़ की तरह सड़कों, मार्गों और जहाँ-तहाँ से बहने उफनने लगा। इससे पहले कि लोग कुछ समझते और कहीं भागते, उन्होंने देखा कि गंदले पानी का एक सैलाब उनपर चढ़ आया है और उनके वाहन पानी में धँसते-धँसते कीचड़ से लबालब भर गए हैं। इधर देखा कि सड़कें कट गई हैं। कहीं पूरा का पूरा मकान नीचे की मिट्टी सरकने के कारण नदी में गिर गया है और उसमें रह रहे लोग मकान समेत नदी की बाढ़ में बहे चले जा रहे हैं। किसी की कार पानी के जलजले में बह गई। कोई बस यात्रियों समेत पहाड़ से नीचे घाटी में गिर गई। चारों ओर मानो महाप्रलय का विनाश छा गया। किसी का बच्चा • छूटा तो किसी का पिता चट्टान के नीचे दब गया।


कारण-दो दिन पहले ही मौसम विभाग ने भयंकर वारिश की चेतावनी दे दी थी। परंतु यह चेतावनी लोगों ने आम चेतावनी की तरह समझी। किसी ने आज तक यह दृश्य नहीं देखा था कि मकान के मकान भड़भड़ा कर नदी में बहते जा रहे हैं। इसलिए न तो कोई संभल पाया और न ही संभल पाने की कोई तैयारी थी। देश भर से लगभग एक लाख पर्यटक इस समय उत्तराखंड की यात्रा पर थे। पर्यटन पूरे यौवन पर था। रास्ते, जो पहले ही कच्चे थे, या बनाए जा रहे थे, या भू-स्खलन के कारण टूटे-फूटे वे भयंकर दरारों में बदल गए। कहीं रास्तों में भू-स्खलन के कारण रास्तों में चट्टानें आ गिरी जिससे आना-जाना बंद हो गया। 

 अकेले चमोली साठ हजार यात्री फंस गए। केदारनाथ में सब कुछ ध्वस्त हो गया। एक मंदिर को छोड़कर सब कुछ स्वाहा हो गया। न दुकानें बचीं, न मकान और न होटल-धर्मशालाएँ, न लोग सब उस पथरीले गंदले सैलाव में नष्ट हो गया। अनुमान के अनुसार हजारों यात्री और स्थानीय लोग काल-कवलित हो गए • विनाश के दृश्य-सैलाब उतरने के बाद एक सप्ताह तक फंसे लोगों को निकालने का सिलसिला जारी रहा। 

भूखे रहे तो कुछ एक सप्ताह तक इस आपात स्थिति की कल्पना न होने के कारण बचाव के उपाय भी नदारद थे। जहाँ देखो, लोगों की चीख-पुकार मची हुई थी। पहाड़ों पर बिजली और टेलीफोन की सुविधा ध्वस्त हो गई थी। इस कारण लोगों का अपने ह-संबंधियों से संपर्क तक टूट गया। न घर से संपर्क रहा और न ही अपने समूह के साथियों के साथ संपर्क रहा। चारों ओर बदहवासी छाई रही। सभी न्यूज़ चैनल हफ्तों तक इस जलजले की हृदय विदारक कहानी दिखाते रहे।


बचने के उपाय-इस बीच देश के लोग सकपकाए से जागे। सामाजिक संगठनों ने अपने-अपने स्तर पर सहायता सामग्री की और पीड़ितों तक पहुँचाने की कोशिश की। दुर्भाग्य से ऐसे कुकृत्य भी सामने आए जबकि पीड़ितों को न केवल लूटा गया,


प्रकार से अपमानित और प्रताड़ित किया गया। इस सैलाब ने देशवासियों को मानो झटके से जगा दिया और यह अहसास

11:40


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निबंध लेखन


भी यात्री फँस गए। अकेले चमोली में साठ हजार यात्री फँस गए। केदारनाथ में सब कुछ ध्वस्त हो गया एक मंदिर को छोड़कर सब कुछ स्वाहा हो गया न दुकानें बर्ची, न मकान और न होटल धर्मशालाएँ, न लोग सब उस पथरीले गंदले सैलाव में नष्ट हो । अनुमान के अनुसार हजारों यात्री और स्थानीय लोग काल-कवलित हो गए।


विनाश के दृश्य-सैलाब उतरने के बाद एक सप्ताह तक फंसे लोगों को निकालने का सिलसिला जारी रहा। कुछ लोग 48 भूखे रहे तो कुछ एक सप्ताह तक इस आपात स्थिति की कल्पना न होने कारण बचाव के उपाय भी नदारद थे। जहाँ देखो, गों की चीख-पुकार मची हुई थी। पहाड़ों पर बिजली और टेलीफोन की सुविधा ध्वस्त हो गई थी। इस कारण लोगों का अपने सगे-संबंधियों से संपर्क तक टूट गया। न घर से संपर्क रहा और न ही अपने समूह के साथियों के साथ संपर्क रहा। चारों ओर बदहवासी छाई रही। सभी न्यूज़ चैनल हफ्तों तक इस जलजले की हृदय विदारक कहानी दिखाते रहे।


बचने के उपाय इस बीच देश के लोग सकपकाए से जागे सामाजिक संगठनों ने अपने-अपने स्तर पर सहायता-सामग्री एकत्र की और पीड़ितों तक पहुँचाने की कोशिश की। दुर्भाग्य से ऐसे कुकृत्य भी सामने आए जबकि पीड़ितों को न केवल लूटा गया, कहर प्रकार से अपमानित और प्रताड़ित किया गया। इस सैलाब ने देशवासियों को मानो झटके से जगा दिया और यह अहसास राया कि देश की सुरक्षा व्यवस्था कितनी कमज़ोर है। यहाँ की सरकारें जन-सुरक्षा और पर्यावरण के प्रति बिलकुल गंभीर नहीं है। सब समय आ गया है कि हम पहाड़ों, नदियों और वनस्पति को अपने सुख के लिए बर्बाद न करें वरना यह प्रकृति अपना बदला अपने हिसाब से लेने लगेगी तो हमारी यह शस्य श्यामला धरती और हमारे बंधु-बांधव हमसे छिन्न-भिन्न हो जाएँगे।


55. प्राकृतिक आपदा कारण और निवारण


विचार-बिंदु प्राकृतिक आपदा के प्रकार उत्तराखंड का जलप्रलय कारण प्रकृति से छेड़छाड़ वनों का कटना पहाड़ों को तोड़कर रास्ते बनाना-बाँध बनाना आदि निवारण के उपाय-अधिक हस्तक्षेप बंद करना-सुरक्षा के उपाय बनाना सहायता व्यवस्था करना।

प्राकृतिक आपदा के प्रकार प्राकृतिक आपदा का अर्थ है-प्रकृति की ओर से आए संकट यह धरती, जिसे मनुष्य अपनी भाषा में आपदा या संकट कहता है, वास्तव में धरती की व्यवस्था है। पहाड़ों का टूटना, समुद्र का अनियंत्रित होना, तूफान आना,

बाढ़े आना, भूकंप आना-ये प्रकृति की अंगड़ाइयाँ हैं निरंतर घूमती हुई पृथ्वी जब भी करवट लेती है तो बड़े-बड़े भूकंप आते हैं

और हमारी बनाई हुई हरी-भरी दुनिया को उजाड़ देती है। वास्तव में पृथ्वी पर हुए निर्माण और विनाश उसकी स्वाभाविक लीलाएँ

हैं। हमें उन लीलाओं के समक्ष सिर झुका कर ही चलना चाहिए। ऐसा दिन कभी नहीं आएगा, जब कि मानव सारे प्राकृतिक संकटों

पर काबू पा लेगा।


उत्तराखंड का जलप्रलय-कुछ दिनों पहले भारत के उत्तराखंड में जलप्रलय आया। पहाड़ों पर बादल फटे घनघोर बारिश हुई। 16 जून रात सवा आठ बजे और 17 जून सुबह 6 बजे ऐसे दो सैलाब आए कि भारत के करीब एक लाख पर्यटक पहाड़ों में फँस गए। जो जहाँ था, वहीं जलप्रलय का शिकार हो गया। किसी की कार-बस में कीचड़ घुस आया, किसी का वाहन जल के वेग में वह गया। कोई होटल या धर्मशाला में बैठे-बैठे उस सैलाव में वह गया। उस होटल में ही उसकी जल समाधि हो गई। आज तक पता नहीं चला कि वे नदी में बहते हुए मकान से बाहर भी निकल सके या मकान समेत बाढ़ में बह गए। किसी के ऊपर चट्टान आ गिरी तो किसी के पाँव के नीचे से धरती खिसक गई। हजारों यात्री तत्काल काल की भेंट चढ़ गए।


कारण इस भयंकर जल सैलाव को लेकर देश भर में चर्चा शुरू हो गई कि इस प्राकृतिक आपदा का मूल कारण क्या है। पर्यावरण के जानकार कहते हैं कि हमने अपनी अंधाधुंध प्रगति की चाह में जिस प्रकार पहाड़ों को काटा है, उनकी छाती में सुरंगें बनाई हैं, वारूद लगाकर विस्फोट किए हैं, उन पर चलने के लिए सड़कें बनाई हैं, उससे पहाड़ों में खलबली मच गई है। भू-स्खलन आम हो गए हैं। पहाड़ों पर सदियों से जमे हुए पत्थर, पेड़ और मिट्टी अपनी जड़ों से उखड़ गई है। इस कारण कोई भी प्राकृतिक तूफान आता है तो भयंकर विनाश छा जाता है। यह सब मानव की करतूत है।

हमसे बदला लेगी। पहाड़ों पर बनाए जाने वाले बाँध तो बहुत बड़ा खतरा है। प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य को इन प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति मिल सकती है। इसका उत्तर है नहीं। वह दिन कभी नहीं आने वाला जबकि हम सभी प्राकृतिक आपदाओं से मुक्त हो जाएँगे। परंतु हमारी समझ में प्राकृतिक छेड़छाड़ के जो-जो कारण

हमें हानि पहुंचा रहे हैं, हम उन पर नियंत्रण कर सकते हैं महात्मा गाँधी ने कहा था यह प्रकृति करोड़ों क्या अरबों-अरबों लोगों का पालन बड़े आराम से कर सकती है किंतु एक भी इनसान की कृष्णा पूरी नहीं कर सकती।

निवारण के उपाय-हमें महात्मा गाँधी के इस संदेश को जीवन में उतारना होगा। अपनी हवस को पूरा करने के लिए वृक्षों को काटना पहाड़ों को काटना, झीलें बनाना, बाँध बनाना बंद करना होगा। शेष सब पशु-पक्षी भी प्राकृतिक प्रगति की चिंता किए बिना जीवन जी रहे हैं। हम भी अपनी तृष्णाओं पर नियंत्रण रखें। जिस काम भी हमें आवश्यक कार्यवाही करनी पड़े तो पहले सुरक्षा के उपाय अपनाएँ। खतरा महसूस हो, कम-से-कम उससे बचें। फिर

मानव-जीवन के लिए यह भी आवश्यक है कि हम प्राकृतिक आपदा आने पर उससे निबटने के उपाय हमेशा तैयार रखें। आग लगने पर कुआँ खोदने में कोई समझदारी नहीं है। आपदाएँ कभी समय देकर नहीं आतीं ये बिना बताए कभी भी, कहीं भी आ सकती हैं। इसलिए में सब जगह के किसी भी जलजले से बच सकते हैं।

हमें हानि पहुंचा रहे हैं, हम उन पर नियंत्रण कर सकते हैं। महात्मा गाँधी ने कहा था यह प्रकृति करोड़ों क्या अरबों-अरबों लोगों का पालन बड़े आराम से कर सकती है किंतु एक भी इनसान की कृष्णा पूरी नहीं कर सकती।

निवारण के उपाय-हमें महात्मा गाँधी के इस सदिश को जीवन में उतारना होगा। अपनी हवस को पूरा करने के लिए वृक्षों को काटना, पहाड़ों को काटना झीलें बनाना, बाँध बनाना बंद करना होगा शेष सब पशु-पक्षी भी प्राकृतिक प्रगति की चिंता किए बिना जीवन जी रहे हैं। हम भी अपनी तृष्णाओं पर नियंत्रण रखें। जिस काम में खतरा महसूस हो, कम-से-कम उससे बचें। फिर भी हमें आवश्यक कार्यवाही करनी पड़े तो पहले सुरक्षा के उपाय अपनाएँ।

मानव-जीवन के लिए यह भी आवश्यक है कि हम प्राकृतिक आपदा आने पर उससे निबटने के उपाय हमेशा तैयार रखें। आग लगने पर कुआँ खोदने में कोई समझदारी नहीं है। आपदाएँ कभी समय देकर नहीं आतीं। वे बिना बताए कभी भी, कहीं भी आ सकती हैं। इसलिए हमें सब जगह आपदा प्रबंधन के उपाय सँवार करके रखने होंगे तभी हम मौत के किसी भी जलजले से बच सकते हैं।