ऊधौ भले लोग आगे के पर हित डोलत धाए। अब अपने मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराएा ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए राज धरम तौ यहै सूर, जो प्रजा न जाहिं सताए ॥

 ऊधौ भले लोग आगे के पर हित डोलत धाए। अब अपने मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराएा ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए राज धरम तौ यहै सूर, जो प्रजा न जाहिं सताए ॥ 

अर्थ


गोपियाँ उद्धव से कहती हैं की आप जाकर कहिएगा कि यहाँ से मथुरा जाते वक्त श्रीकृष्ण हमारा मन भी अपने साथ ले गए थे, उसे वे वापस कर दें। वे अत्याचारियों को दंड देने का काम करने मथुरा गए हैं परन्तु वे स्वयं अत्याचार करते हैं। आप उनसे कहिएगा कि एक राजा को हमेशा चाहिए की वो प्रजा की हित का ख्याल रखे। उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुँचने दे, यही राजधर्म है।