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ऊधौ भले लोग आगे के पर हित डोलत धाए। अब अपने मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराएा ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए राज धरम तौ यहै सूर, जो प्रजा न जाहिं सताए ॥