हरषि राम भेटेउ हनुमाना। अति कृतग्य परम सुजाना ॥ तुरत वैद तब कीन्हि उपाई। उठि बैठे लछिमन हरपाई ॥ हृदयँ लाइ प्रभु भेटेउ भ्राता। हरपे सकल भालु कपि व्राता ॥ कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि विधि तवहिताहि लइ आवा ॥

 हरषि राम भेटेउ हनुमाना। अति कृतग्य परम सुजाना ॥ तुरत वैद तब कीन्हि उपाई। उठि बैठे लछिमन हरपाई ॥ हृदयँ लाइ प्रभु भेटेउ भ्राता। हरपे सकल भालु कपि व्राता ॥ कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि विधि तवहिताहि लइ आवा ॥


प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह, भाग-2' में सकलित "लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप प्रसंग से उद्धृत है। यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकांड से लिया गया है। इसके रचयिता कवि तुलसीदास हैं। इस प्रसंग में लक्ष्मण के स्वस्थ होकर उठने तथा सभी की प्रसन्नता का वर्णन है।


व्याख्या हनुमान के आने पर राम ने प्रसन्न होकर उन्हें गले से लगा लिया। परम चतुर और एक समझदार व्यक्ति की तरह भगवान राम ने हनुमान के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की। वैद्य ने शीघ्र ही उपचार किया जिससे लक्ष्मण उठकर बैठ गए और बहुत प्रसन्न हुए। लक्ष्मण को राम ने गले से लगाया। इस दृश्य को देखकर भालुओं और वानरों के समूह में खुशी छा गई। हनुमान ने वैद्यराज को वहीं उसी तरह पहुँचा दिया जहाँ से वे उन्हें लेकर आए थे।