खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, वलि, वनिक को वनिज, न चाकर को चाकटी। जीविका विहीन लोग सीधमान सोच वस, कहें एक एकन सों कहाँ जाई, का कटी ?" वेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ विलोकिअत, सॉकरे सवे पे, राम! टावरं कृपा कटी। दारिद- :-दसानन दवाई दुनी, दीनबंधु ! दुरित दहन देखि तुलसी हहा की ॥ -
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खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, वलि, वनिक को वनिज, न चाकर को चाकटी। जीविका विहीन लोग सीधमान सोच वस, कहें एक एकन सों कहाँ जाई, का कटी ?" वेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ विलोकिअत, सॉकरे सवे पे, राम! टावरं कृपा कटी। दारिद- :-दसानन दवाई दुनी, दीनबंधु ! दुरित दहन देखि तुलसी हहा की ॥ -
पहले सवैये में कवि अकाल की स्थिति का चित्रण करता है। इस समय किसान खेती नहीं कर सकता, भिखारी को भीख नहीं मिलती, व्यापारी व्यापार नहीं कर पाता तथा नोकरी की चाह रखने वालों को नौकरी नहीं मिलती। लोगों के पास आजीविका का कोई साधन नहीं है। वे विवश हैं। वेद-पुराणों में कहीं ओर दुनिया की देखी वातों से अव यही प्रतीत होता है कि अव तो भगवान राम की कृपा से ही कुशल होगी। वह राम से प्रार्थना करते हैं कि अब आप ही इस दरिद्रता रूपी रावण का विनाश कर सकते हैं।