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खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, वलि, वनिक को वनिज, न चाकर को चाकटी। जीविका विहीन लोग सीधमान सोच वस, कहें एक एकन सों कहाँ जाई, का कटी ?" वेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ विलोकिअत, सॉकरे सवे पे, राम! टावरं कृपा कटी। दारिद- :-दसानन दवाई दुनी, दीनबंधु ! दुरित दहन देखि तुलसी हहा की ॥ -

खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, वलि, वनिक को वनिज, न चाकर को चाकरी | जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच वस, कहैं एक एकन सों कहाँ जाई, का करी ?' वेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ विलोकि अत, साँकरे सवै पै, राम! रावरें कृपा करी । दारिद-दसानन दवाई दुनी, दीनबंधु ! दुरित दहन देखि तुलसी हहा करी ॥