मम हित लागि तजेहु पितु माता सहेहु विपिन हिम आतप वाता॥ सो अनुराग कहाँ अब भाई । उठहु न सुनि मम वच विकलाई॥ जो जनतेऊँ वन बंधु विछोहु पिता वचन मनतेॐ नहि ओहू ॥
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5.1 व्याख्या करें.
मम हित लागि तजेहु पितु माता सहेहु विपिन हिम आतप वाता॥ सो अनुराग कहाँ अब भाई । उठहु न सुनि मम वच विकलाई॥ जो जनतेऊँ वन बंधु विछोहु पिता वचन मनतेॐ नहि ओहू ॥
उत्तर:- लक्ष्मण के मूर्छित होने पर राम विलाप करते हुए कहते हैं- हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव सदा से ही मेरे लिए कोमल था। मेरे हित के लिए तुमने माता-पिता को भी छोड़ दिया और वन में जाड़ा, गरमी और हवा सब कुछ सहन किया किन्तु वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुलतापूर्ण वचन सुनकर तुम उठते क्यों नहीं? यदि मुझे ज्ञात होता कि वन में में अपने भाई से विछड़ जाऊँगा मैं पिता के वचनों (जिसका मानना मेरे लिए परम कर्तव्य था) को कभी न मानता और न ही तुम्हें अपने साथ लेकर वन आता।
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