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मम हित लागि तजेहु पितु माता सहेहु विपिन हिम आतप वाता॥ सो अनुराग कहाँ अब भाई । उठहु न सुनि मम वच विकलाई॥ जो जनतेऊँ वन बंधु विछोहु पिता वचन मनतेॐ नहि ओहू ॥