कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥ तात कपिन्ह सव निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे ॥ दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी भट अतिकाय अकंपन भारी॥ अपर महोदर आदिक वीरा। परे समर महि सब रनधीरा ॥ सुनि दसकंधर वचन तब कुंभकरन विलखाना। जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥

 कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥ तात कपिन्ह सव निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे ॥ दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी भट अतिकाय अकंपन भारी॥ अपर महोदर आदिक वीरा। परे समर महि सब रनधीरा ॥

सुनि दसकंधर वचन तब कुंभकरन विलखाना। जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥


प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह, भाग-2 में सकलित लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप प्रसंग से उद्धृत है। यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकाड से लिया गया है। इसके रचयिता कवि तुलसीदास हैं। इस प्रसंग में कुंभकरण व रावण के वार्तालाप का वर्णन है।

व्याख्या अभिमानी रावण ने जिस प्रकार से सीता का हरण किया था उसकी और उसके बाद तक की सारी कथा उसने कुंभकरण को सुनाई। रावण ने बताया कि हे तात. हनुमान ने सब राक्षस मार डाले है। उसने महान महान योद्धाओं का संहार कर दिया है दुर्मुख, देवशत्रु नरातक, महायोद्धा, अतिकाय, अकपन और महोदर आदि अनेक वीर युद्धभूमि में मरे पड़े हैं।

दोहा

रावण की बातें सुनकर कुंभकरण विलखने लगा और बोला कि अरे मूर्ख, जगत जननी जानकी को चुराकर अव तू कल्याण चाहता है? यह संभव नहीं है।