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कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥ तात कपिन्ह सव निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे ॥ दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी भट अतिकाय अकंपन भारी॥ अपर महोदर आदिक वीरा। परे समर महि सब रनधीरा ॥ सुनि दसकंधर वचन तब कुंभकरन विलखाना। जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥