वैसेड राज-समाज वने, गज-बाजि घने, मन संभ्रम छायौ । वैसेइ कंचन के सब धाम है, द्वारिके के महिलों फिरि आयौ । भौन विलोकिवे को मन लोचत सोचत ही सब गाँव मँझायौ। पूछत पाँड़े फिरें सबसों पर झोपरी को कहूँ खोज न पायौ ॥

 




वैसेड राज-समाज वने, गज-बाजि घने, मन संभ्रम छायौ । वैसेइ कंचन के सब धाम है, द्वारिके के महिलों फिरि आयौ । भौन विलोकिवे को मन लोचत सोचत ही सब गाँव मँझायौ। पूछत पाँड़े फिरें सबसों पर झोपरी को कहूँ खोज न पायौ ॥


सुदामा चरित भावार्थ: जब सुदामा अपने गाँव पहुंचते हैं, तो उन्हें आसपास सबकुछ बदला बदला दिखता है। सामने बड़े महल, हाथी घोड़े, गाजे-बाजे आदि देखकर सुदामा जी सोचते हैं कि कहीं मैं रास्ता भटककर फिर से द्वारका नगरी तो नहीं आ पहुंचा हूँ? मगर, थोड़ा ध्यान से देखने पर वो समझ जाते हैं कि ये उनका अपना गाँव ही है। फिर उन्हें अपनी झोपड़ी की चिंता सताती है, वो बहुत लोगों से पूछते हैं, मगर अपनी झोपड़ी को ढूँढ नहीं पाते।