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वैसेड राज-समाज वने, गज-बाजि घने, मन संभ्रम छायौ । वैसेइ कंचन के सब धाम है, द्वारिके के महिलों फिरि आयौ । भौन विलोकिवे को मन लोचत सोचत ही सब गाँव मँझायौ। पूछत पाँड़े फिरें सबसों पर झोपरी को कहूँ खोज न पायौ ॥