मै जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ, सुख-दुख दोनों में मगन रहा करता हूँ, जग भव सागर तरने की नाव बनाए, मैं, भव मौजों पर मस्त वहा करता हूँ।

 मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ, मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;

है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता

मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ।

मै जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ, सुख-दुख दोनों में मगन रहा करता हूँ, जग भव सागर तरने की नाव बनाए,

मैं, भव मौजों पर मस्त वहा करता हूँ।


व्याख्या प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह, भाग-2' में संकलित कविता आत्मपरिचय से अवतरित है। इसके रचयिता प्रसिद्ध गीतकार हरिवंशराय बच्चन हैं। इस कविता में कवि जीवन को जीने की शैली बताता है। साथ ही दुनिया से अपने द्वंद्वात्मक संबंधों को उजागर करता है। व्याख्या- कवि अपने मन की भावनाओं को दुनिया के सामने कहने की कोशिश करता है। उसे खुशी के जो उपहार मिले हैं, उन्हें वह साथ लिए फिरता है। उसे यह संसार अधूरा लगता है। इस कारण यह उसे पसंद नहीं है। वह अपनी कल्पना का संसार लिए फिरता है। उसे प्रेम से भरा संसार अच्छा लगता है। वह कहता है कि मैं अपने हृदय में आग जलाकर उसमें जलता हूँ अर्थात मैं प्रेम की जलन को स्वयं ही सहन करता हूँ। प्रेम की दीवानगी में मस्त होकर जीवन के जो सुख-दुख आते हैं, उनमें मस्त रहता हूँ। यह संसार आपदाओं का सागर है। लोग इसे पार करने के लिए कर्म रूपी नाव बनाते हैं, परंतु कवि संसार रूपी सागर की लहरों पर मस्त होकर बहता है। उसे संसार की कोई चिंता नहीं है।