कै वह टूटि-सि छानि हती कहाँ, कंचन के सव धाम सुहावत। कै पग़ में पनही न हती कहूँ, लै गजराजहु ठाढ़े महावत ॥ भूमि कठोर पै रात कटै कहाँ, कोमल सेज पै नींद न आवत। कै जुरतो नहिं कोदो स्वाँ प्रभु के परताप तै दाख न भावत ॥







 कै वह टूटि-सि छानि हती कहाँ, कंचन के सव धाम सुहावत। कै पग़ में पनही न हती कहूँ, लै गजराजहु ठाढ़े महावत ॥ भूमि कठोर पै रात कटै कहाँ, कोमल सेज पै नींद न आवत। कै जुरतो नहिं कोदो स्वाँ प्रभु के परताप तै दाख न भावत ॥


सुदामा चरित भावार्थ: जब सुदामा जी को श्रीकृष्ण की महिमा समझ आती है, तो वो उनकी महिमा गाने लगते हैं। वो सोचते हैं कि कहाँ तो मेरे सिर पर टूटी झोंपड़ी थी, अब सोने का महल मेरे सामने खड़ा है। कहाँ तो मेरे पास पहनने को जूते नहीं थे, अब मेरे सामने हाथी की सवारी लेकर महावत खड़े हैं। कठोर ज़मीन की जगह मेरे पास नरम विस्तर हैं। पहले मेरे पास दो वक्त खाने को चावल भी नहीं होते थे, अब मनचाहे पकवान हैं। ये सब प्रभु की कृपा से ही संभव हुआ है, उनकी लीला अपरम्पार है।