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कै वह टूटि-सि छानि हती कहाँ, कंचन के सव धाम सुहावत। कै पग़ में पनही न हती कहूँ, लै गजराजहु ठाढ़े महावत ॥ भूमि कठोर पै रात कटै कहाँ, कोमल सेज पै नींद न आवत। कै जुरतो नहिं कोदो स्वाँ प्रभु के परताप तै दाख न भावत ॥