कै वह टूटि-सि छानि हती कहाँ, कंचन के सव धाम सुहावत। कै पग़ में पनही न हती कहूँ, लै गजराजहु ठाढ़े महावत ॥ भूमि कठोर पै रात कटै कहाँ, कोमल सेज पै नींद न आवत। कै जुरतो नहिं कोदो स्वाँ प्रभु के परताप तै दाख न भावत ॥ on May 02, 2022 कंचन के सव धाम सुहावत। कै वह टूटि-सि छानि हती कहाँ +