मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूं, शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूं, हो जिस पर भूपों के प्रसाद निछावर मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ!
- Get link
- X
- Other Apps
मैं और, और जब और कहां का नाता, मैं वनावना कितनी जग रोज मिटाता; जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव, मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूं, शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूं, हो जिस पर भूपों के प्रसाद निछावर मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ!
प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह, भाग-2 में संकलित कविता आत्मपरिचय से उद्धृत है। इसके रचयिता प्रसिद्ध गीतकार हरिवंशराय बच्चन हैं। इस कविता में कवि जीवन को जीने की शैली बताता है। साथ ही दुनिया से अपने द्वंद्वात्मक संबंधों को उजागर करता है।
व्याख्या कवि कहता है कि मुझमें और संसार दोनों में कोई संबंध नहीं है। संसार के साथ मेरा टकराव चल रहा है। कवि अपनी कल्पना के अनुसार संसार का निर्माण करता है, फिर उसे मिटा देता है। यह संसार इस धरती पर सुख के साधन एकत्रित करता है, परंतु कवि हर कदम पर धरती को ठुकराया करता है। अर्थात वह जिस संसार में रह रहा है, उसी के प्रतिकूल आचार-विचार रखता है।
कवि कहता है कि वह अपने रोदन में भी प्रेम लिए फिरता है। उसकी शीतल वाणी में भी आग समाई हुई है अर्थात उसमें असंतोष झलकता है। उसका जीवन प्रेम में निराशा के कारण खंडहर सा है, फिर भी उस पर राजाओं के महल न्योछावर होते हैं। ऐसे खंडहर का वह एक हिस्सा लिए घूमता है जिसे महल पर न्योछावर कर सके।
- Get link
- X
- Other Apps