कछु भाभी हमको दियौ, सो तुम काहे न देत चाँपि पोटरी काँख में रहे कहौ केहि हेत ॥ आगे चना गुरु मातु दिये त, लिये तुम चावि हमे नहिं दीने। श्याम कहाँ मुसुकाय सुदामा सों, चोरि कि वानि में हौ जू प्रवीने ॥ पोटरि कॉख में चॉपि रहे तुम, खोलत नाहि सुधा रस भीने । पाछिलि बानि अजौं न तजी तुम, तैसइ भाभी के तंदुल कीने ॥
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कछु भाभी हमको दियौ, सो तुम काहे न देत चाँपि पोटरी काँख में रहे कहौ केहि हेत ॥ आगे चना गुरु मातु दिये त, लिये तुम चावि हमे नहिं दीने। श्याम कहाँ मुसुकाय सुदामा सों, चोरि कि वानि में हौ जू प्रवीने ॥ पोटरि कॉख में चॉपि रहे तुम, खोलत नाहि सुधा रस भीने । पाछिलि बानि अजौं न तजी तुम, तैसइ भाभी के तंदुल कीने ॥
सुदामा चरित भावार्थ: सुदामा जी की अच्छी आवभगत करने के बाद कान्हा उनसे मजाक करने लगते हैं। वो सुदामा जी से कहते हैं कि जरूर भाभी ने मेरे लिए कुछ भेजा होगा, तुम उसे मुझे दे क्यों नहीं रहे हो? तुम अभी तक सुधरे नहीं। जैसे, बचपन में जब गुरुमाता ने हमें चने दिए थे, तो तुम तब भी चुपके से मेरे हिस्से के चने खा गए थे। वैसे ही आज तुम मुझे भाभी का दिया उपहार नहीं दे रहे हो।
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