तव प्रताप उर राखि प्रभु, जैहउँ नाक तुरंग। अस काहि आयसु पाइ पद, वंदि चलेउ हनुमंत भरत वाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार । मन महुँ जात सराहत, पुनि पुनि पवनकुमार

 तव प्रताप उर राखि प्रभु, जैहउँ नाक तुरंग।

अस काहि आयसु पाइ पद, वंदि चलेउ हनुमंत

भरत वाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार ।

मन महुँ जात सराहत, पुनि पुनि पवनकुमार




प्रसंग प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक आरोह, भाग-2 में संकलित लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप प्रसंग से उद्धृत है। यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकांड से लिया गया है। इसके रचयिता कवि तुलसीदास हैं। इस प्रसंग में लक्ष्मण मूर्च्छा पर राम के करुण विलाप का वर्णन किया गया है।


व्याख्या- हे नाथ! हे प्रभो! मैं आपका प्रताप हृदय में रखकर तुरंत यानी समय से वहाँ पहुँच जाऊँगा। ऐसा कहकर और भरत जी से आज्ञा लेकर एवं उनके चरणों की वंदना करके हनुमान जी चल दिए। भरत के शील स्वभाव तथा प्रभु के चरणों में उनकी अपार भक्ति को मन में बार-बार सराहते हुए हनुमान बूटी लेकर लंका की तरफ चले जा रहे थे।