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तव प्रताप उर राखि प्रभु, जैहउँ नाक तुरंग। अस काहि आयसु पाइ पद, वंदि चलेउ हनुमंत भरत वाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार । मन महुँ जात सराहत, पुनि पुनि पवनकुमार